ApnaCg@कोयला घोटाला की आपार सफलता के बाद पूर्व मंत्री अमरजीत भगत का एक और काला कारनामा आया सामने,बंगाली पट्टा की जमीनें कम कीमत पर खरीद प्रीमियम कीमत पर बेचने पूर्व मंत्री ने चलाया सिंडिकेट

0

रायपुर@अपना छत्तीसगढ़। सरगुजा, सूरजपुर जिला प्रशासन से मिली जानकारी के बाद आयकर अन्वेषण विंग ने पूर्व मंत्री अमरजीत भगत के एक बड़े जमीन घोटाले का पर्दाफाश किया है। उन पर बांग्लादेश के शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए बनी सरकारी जमीन हड़पने का आरोप है। आयकर विभाग ने इसे संज्ञेय अपराध बताते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव को भगत के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई करने के लिए पत्र लिखा है। आयकर विभाग ने इस साल 31 जनवरी से चार दिवसीय अभियान में भगत और अन्य के खिलाफ तलाशी और जब्ती की कार्रवाई की थी। इसमें रायपुर, सरगुजा में कुछ जमीन खरीदी के दस्तावेज न तलाशी में विभिन्न स्थानों पर छापेमारी की गई। जब्ती के आधार पर आयकर विभाग ने पूर्व कांग्रेस मंत्री भगत के खिलाफ विस्तृत रिपोर्ट तैयार की है, जिसमें 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर जिले में आए बांग्लादेश के शरणार्थियों के पुनर्वास के लिए बनी सरकारी जमीन पर कब्जा करके संपत्ति अर्जित करने के लिए सत्ता के व्यवस्थित दुरुपयोग की ओर इशारा किया गया है। बांग्लादेश से आए शरणार्थियों को अंबिकापुर के सुभाष नगर क्षेत्र में और उसके आसपास जमीन आवंटित की गई थी। इन जमीनों को भूमि अभिलेखों के अनुसार ‘पुनर्वास पट्टा’ जिसे स्थानीय बोलचाल में ‘बंगाली पट्टा’ के नाम से जाना जाता था। आयकर विभाग के प्रधान निदेशक कार्यालय से भेजे गए पत्र में पीडीआईटी (जांच) सुनील कुमार सिंह ने मुख्य सचिव अमिताभ जैन का ध्यान इन चौंकाने वाले खुलासों की ओर आकर्षित किया है। पत्र की एक प्रति पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) अशोक जुनेजा को भी भेजी गई है। पुलिस मुख्यालय (पीएचक्यू), अटल नगर, नया रायपुर।

1 फरवरी को जारी 35 पन्नों के एक विज्ञप्ति में मुख्य सचिव का ध्यान आकर्षित करते हुए इसे ‘स्वत: स्पष्ट’ बताया गया है तथा इसे ‘संज्ञेय अपराध’ के रूप में रेखांकित किया गया है। आयकर तलाशी अभियान के निष्कर्षों को संज्ञान में लाने वाले पत्र में राज्य सरकार से आवश्यक सत्यापन तथा जांच करवाने के पश्चात उचित कार्रवाई करने के लिए भी कहा गया है।

तलाशी कार्रवाई के संबंध में आयकर विभाग के प्रमुख निष्कर्षों से पता चला है कि किस प्रकार अंबिकापुर जिला कांग्रेस कमेटी (डीसीसी) शहरी के महासचिव राजू अग्रवाल उर्फ राजीव अग्रवाल ने तत्कालीन मंत्री अमरजीत भगत से निकटता के कारण जिला कलेक्टर से अनुमति प्राप्त कर बहुत कम कीमत पर ‘बंगाली पट्टा’ खरीदने का सिंडिकेट चलाया। (दो माह पहले ईडी के छापे के बाद से राजीव का मकान सील कर दिया गया) बाद में उन्हीं ‘बंगाली पट्टा’ भूमि को भगत के रिश्तेदारों सहित अन्य व्यक्तियों को बहुत अधिक/प्रीमियम कीमतों पर बेच दिया गया। यह सब संभव हो पाया, क्योंकि अग्रवाल, जो आरा मिल और फर्नीचर शोरूम के मालिक भी हैं, भगत के साथ अपने घनिष्ठ संबंधों के कारण मजबूत राजनीतिक पकड़ रखते थे। छत्तीसगढ़ में बघेल के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार के दौरान भगत को पूर्ण शक्ति प्राप्त थी।

1-टी विभाग की रिपोर्ट में दर्ज ये सनसनीखेज खुलासे, भगत से जुड़े, उनसे संबंधित या उनके निजी सहायक रहे कई व्यक्तियों और अन्य लोगों के दर्ज बयानों पर आधारित हैं। रिपोर्ट में ये बयान आयकर अधिनियम की धारा 131 के तहत दर्ज किए गए थे। स्वेता कमलेश पाटिल, उप निदेशक आयकर, डीडीआईटी, (जांच) द्वारा संकलित रिपोर्ट रितुपर्ण नामदेव, अतिरिक्त निदेशक आयकर, एडीआईटी (जांच) को सौंपी गई, जिन्होंने इसे औपचारिक रूप से पीडीआईटी सुनील कुमार सिंह को 4 फरवरी, 2024 को पुष्टि दस्तावेजों और दर्ज बयानों के साथ प्रस्तुत किया।

साय ने कहा-भगत ने और भी कई जमीन घोटाले किए:साय

भगत पर जमीन घोटाले को लेकर मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि उन्होंने और भी कई जमीन घोटाले किए हैं। पिछली सरकार में कांग्रेस के लोगों ने भारी जमीन घोटाला किया।कांग्रेस सरकार में अमरजीत भगत जशपुर के प्रभारी मंत्री थे। उस दौरान उन्होंने कोरवा परिवार की 25 एकड़ जमीन अपने बेटे के नाम से रजिस्ट्री करा ली थी। हम उस समय भाजपा प्रदेश अध्यक्ष के दायित्व पर थे, और हमने जांच कमेटी बनाई। जांच रिपोर्ट के आधार पर हमने पीडि़त परिवार को बुलाया था। उन्हें तत्कालीन राज्यपाल से मुलाकात कराई थी, उन्होंने राज्यपाल को आपबीती सुनाई थी। इसके बाद विवश होकर अमरजीत भगत को जमीन वापस लौट आना पड़ा था।

भ्रष्ट नेता बिना नौकरशाही की मदद के सरकारी धन की लूट नहीं कर सकते?

अवैध निजी लाभ के लिये सरकारी अधिकारियों द्वारा अपने विधायी शक्तियों का उपयोग राजनैतिक भ्रष्टाचार कहलाता है। किन्तु सामान्यतः सरकारी शक्तियों का दुरुपयोग (जैसे अपने राजनैतिक प्रतिद्वंदियों को सताना/दबाना, पुलिस की निर्दयता आदि) राजनैतिक भ्रष्टाचार में नहीं गिना जाता।भ्रष्टाचार (आचरण) की कई किस्में और डिग्रियाँ हो सकती हैं, लेकिन समझा जाता है कि राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार समाज और व्यवस्था को सबसे ज़्यादा प्रभावित करता है। अगर उसे संयमित न किया जाए तो भ्रष्टाचार मौजूदा और आने वाली पीढ़ियों के मानस का अंग बन सकता है। मान लिया जाता है कि भ्रष्टाचार ऊपर से नीचे तक सभी को, किसी को कम तो किसी को ज़्यादा, लाभ पहुँचा रहा है। राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार एक-दूसरे से अलग न हो कर परस्पर गठजोड़ से पनपते हैं।
ये भ्रष्ट नेता बिना नौकरशाही की मदद के सरकारी धन की यह लूट नहीं कर सकते थे। ख़ास बात यह है कि इस भ्रष्टाचार में निजी क्षेत्र और कॉरपोरेट पूँजी की भूमिका भी शालिम होती है। बाज़ार की प्रक्रियाओं और शीर्ष राजनीतिक- प्रशासनिक मुकामों पर लिए गये निर्णयों के बीच साठगाँठ के बिना यह भ्रष्टाचार इतना बड़ा रूप नहीं ले सकता। आज़ादी के बाद भारत में भी राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार की यह परिघटना तेज़ी से पनपी है। एक तरफ़ शक किया जाता है कि बड़े-बड़े राजनेताओं का अवैध धन स्विस बैंकों के ख़ुफ़िया ख़ातों में जमा है और दूसरी तरफ़ तीसरी श्रेणी के क्लर्कों से लेकर आईएएस अफ़सरों के घरों पर पड़ने वाले छापों से करोड़ों-करोड़ों की सम्पत्ति बरामद हुई है। राजनीतिक और प्रशासनिक भ्रष्टाचार को ठीक से समझने के लिए अध्येताओं ने उसे दो श्रेणियों में बाँटा है। सरकारी पद पर रहते हुए उसका दुरुपयोग करने के ज़रिये किया गया भ्रष्टाचार और राजनीतिक या प्रशासनिक हैसियत को बनाये रखने के लिए किया जाने वाला भ्रष्टाचार। पहली श्रेणी में निजी क्षेत्र को दिये गये ठेकों और लाइसेंसों के बदले लिया गया कमीशन, हथियारों की ख़रीद-बिक्री में लिया गया कमीशन, फ़र्जीवाड़े और अन्य आर्थिक अपराधों द्वारा जमा की गयी रकम, टैक्स-चोरी में मदद और प्रोत्साहन से हासिल की गयी रकम, राजनीतिक रुतबे का इस्तेमाल करके धन की उगाही, सरकारी प्रभाव का इस्तेमाल करके किसी कम्पनी को लाभ पहुँचाने और उसके बदले रकम वसूलने और फ़ायदे वाली नियुक्तियों के बदले वरिष्ठ नौकरशाहों और नेताओं द्वारा वसूले जाने वाले अवैध धन जैसी गतिविधियाँ पहली श्रेणी में आती हैं। दूसरी श्रेणी में चुनाव लड़ने के लिए पार्टी-फ़ण्ड के नाम पर उगाही जाने वाली रकमें, वोटरों को ख़रीदने की कार्रवाई, बहुमत प्राप्त करने के लिए विधायकों और सांसदों को ख़रीदने में ख़र्च किया जाने वाला धन, संसद-अदालतों, सरकारी संस्थाओ, नागर समाज की संस्थाओं और मीडिया से अपने पक्ष में फ़ैसले लेने या उनका समर्थन प्राप्त करने के लिए ख़र्च किये जाने वाले संसाधन और सरकारी संसाधनों के आबंटन में किया जाने वाला पक्षपात आता है।राजनीतिक-प्रशासनिक भ्रष्टाचार को समझने के लिए ज़रूरी है कि इन दोनों श्रेणियों के अलावा एक और विभेदीकरण किया जाए। यह है शीर्ष पदों पर होने वाला बड़ा भ्रष्टाचार और निचले मुकामों पर होने वाला छोटा-मोटा भ्रष्टाचार। सूज़न रोज़ एकरमैन ने अपनी रचना करप्शन ऐंड गवर्नमेंट : कॉजिज़, कांसिक्वेसिंज़ ऐंड रिफ़ॉर्म में शीर्ष पदों पर होने वाले भ्रष्टाचार को ‘क्लेप्टोक्रैसी’ की संज्ञा दी गयी है। किसी भी तंत्र  के शीर्ष पर बैठा कोई बड़ा राजनेता या कोई बड़ा नौकरशाह एक निजी इजारेदार पूँजीपति की तरह आचरण कर सकता है। हालाँकि एकरमैन ने भारत के उदाहरण पर न के बराबर ही ग़ौर किया है, पर भारत में पब्लिक सेक्टर संस्थाओं के मुखिया अफ़सरों को ‘सरकारी मुग़लों’ की संज्ञा दी जा चुकी है। न्यायाधीशों द्वारा किये जाने वाले न्यायिक भ्रष्टाचार की परिघटना भारत में अभी नयी है लेकिन उसका असर दिखाई देने लगा है। दिल्ली में हुए राष्ट्रमण्डलीय खेलों के आयोजन में हुए भीषण भ्रष्टाचार के पीछे भी नेताओं और अफ़सरों का शीर्ष खेल ही था। टू जी स्पेक्ट्रम के आबंटन में हुए भ्रष्टाचार को भी क्लेप्टोक्रैसी के ताज़े उदाहरण के तौर पर लिया जा सकता है। निचले स्तर पर होने वाला भ्रष्टाचार ‘स्पीड मनी’ या ‘सुविधा शुल्क’ के तौर पर जाना जाता है। थाना स्तर के पुलिस अधिकारी, बिक्री कर या आय कर अधिकारी, सीमा और उत्पाद-शुल्क अधिकारी और विभिन्न किस्म के इंस्पैक्टर इस तरह के भ्रष्टाचार से लाभांवित होते हैं। इसी तरह ज़िला स्तर पर दिये जाने वाले ठेकों के आबंटन में पूरे ज़िला प्रशासन में कमीशन की रकम का बँटना एक आम बात है।यहाँ इन दोनों तरह के भ्रष्टाचारों के मूल्यांकन संबंधी विवाद का ज़िक्र करना ज़रूरी है। सार्वजनिक जीवन में अक्सर यह बहस होती रहती है कि क्लेप्टोक्रैसी ज़्यादा बड़ी समस्या है, या फिर सुविधा शुल्क? समाज शीर्ष पदों पर होने वाले भ्रष्टाचार से अधिक प्रभावित होता है, या निचले स्तर पर होने वाले अपेक्षाकृत छोटे भ्रष्टाचार से? इस बहस के पीछे एक विमर्श है जो क्लेप्टोक्रैसी से जुड़ा हुआ है। सत्तर और अस्सी के दशकों में देखा यह गया था कि कई बार शीर्ष पर बैठे हुए क्लेप्टोक्रैटिक शासक या अफ़सर निचले स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार को नापसंद करते हैं। उन्हें लगता था कि इस छुटभैये भ्रष्टाचार से व्यवस्था बदनाम होती है और अवैध लाभ उठाने की ख़ुद उनकी क्षमता घट जाती है। इस दृष्टिकोण में निचले स्तर का भ्रष्टाचार प्रशासनिक अक्षमता का द्योतक था।यह सही है कि छोटे स्तर का भ्रष्टाचार रिश्वतखोरी को पूरे समाज में विकेंद्रित कर देता है। एकरमैन ने भी अपनी रचना में इस पहलू की शिनाख्त की है। भारत में इसके सामाजिक प्रभाव का एक उदाहरण विवाह के बाज़ार में लाभ के पदों पर बैठे वरों की ऊँची दहेज-दरों के रूप में देखा जा सकता है। लेकिन दूसरी तरफ़ भारतीय उदाहरण ही यह बताता है कि भ्रष्टाचार का यह रूप न केवल शीर्ष पदों पर होने वाली कमीशनखोरी, दलाली और उगाही से जुड़ता है, बल्कि दोनों एक-दूसरे को पानी देते हैं। पिछले बीस वर्षों से भारतीय लोकतंत्र में राज्य सरकारों के स्तर पर सत्तारूढ़ निज़ाम द्वारा अगला चुनाव लड़ने के लिए नौकरशाही के ज़रिये नियोजित उगाही करने की प्रौद्योगिकी लगभग स्थापित हो चुकी है। इस प्रक्रिया ने क्लेप्टोक्रैसी और सुविधा शुल्क के बीच का फ़र्क काफ़ी हद तक कम कर दिया है। भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में चुनाव लड़ने और उसमें जीतने-हारने की प्रक्रिया अवैध धन के इस्तेमाल और उसके परिणामस्वरूप भ्रष्टाचार का प्रमुख स्रोत बनी हुई है। यह समस्या अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण के दिनों में भी थी, लेकिन बाज़ारोन्मुख व्यवस्था के ज़माने में इसने पहले से कहीं ज़्यादा भीषण रूप ग्रहण कर लिया है। एक तरफ़ चुनावों की संख्या और बारम्बारता बढ़ रही है, दूसरी तरफ़ राजनेताओं को चुनाव लड़ने और पार्टियाँ चलाने के लिए धन की ज़रूरत। नौकरशाही का इस्तेमाल करके धन उगाहने के साथ-साथ राजनीतिक दल निजी स्रोतों से बड़े पैमाने पर ख़ुफ़िया अनुदान प्राप्त करते हैं। यह काला धन होता है। बदले में नेतागण उन्हीं आर्थिक हितों की सेवा करने का वचन देते हैं। निजी पूँजी न केवल उन नेताओं और राजनीतिक पार्टियों की आर्थिक मदद करती है जिनके सत्ता में आने की सम्भावना है, बल्कि वह चालाकी से हाशिये पर पड़ी राजनीतिक ताकतों को भी पटाये रखना चाहती है ताकि मौका आने पर उनका इस्तेमाल कर सके। राजनीतिक भ्रष्टाचार के इस पहलू का एक इससे भी ज़्यादा अँधेरा पक्ष है। एक तरफ़ संगठित अपराध जगत द्वारा चुनाव प्रक्रिया में धन का निवेश और दूसरी तरफ़ स्वयं माफ़िया सरदारों द्वारा पार्टियों के उम्मीदवार बन कर चुनाव जीतने की कोशिश करना। इस पहलू को राजनीति के अपराधीकरण के रूप में भी देखा जाता है।चुनाव प्रणालियों का भ्रष्टाचार की समस्या के आईने में तुलनात्मक अध्ययन भी किया गया है। कई विद्वानों ने एक अध्ययन में दिखाया है कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व (जैसे अमेरिकी चुनावी प्रणाली) फ़र्स्ट-पास्ट-दि-पोस्ट (जैसे भारतीय चुनावी प्रणाली) के मुकाबले राजनीतिक भ्रष्टाचार के अंदेशों से ज़्यादा ग्रस्त होती है। इसके पीछे तर्क दिया गया है कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से सांसद या विधायक चुनने वाली प्रणाली बहुत अधिक ताकतवर राजनीतिक दलों को प्रोत्साहन देती है। इन पार्टियों के नेता राष्ट्रपति के साथ, जिसके पास इस तरह की प्रणालियों में काफ़ी कार्यकारी अधिकार होते हैं, भ्रष्ट किस्म की सौदेबाज़ियाँ कर सकते हैं।इस विमर्श का दूसरा पक्ष यह मान कर चलता है कि अगर वोटरों को नेताओं के भ्रष्टाचार का पता लग गया तो वे अगले चुनाव में उन्हें सज़ा देंगे और ईमानदार प्रतिनिधियों को चुनेंगे। लेकिन, ऐसा हमेशा नहीं होता। अक्सर वोटरों के सामने एक तरफ़ सत्तारूढ़ भ्रष्ट और दूसरी तरफ़  विपक्ष में बैठे संदिग्ध चरित्र के नेता के बीच चुनाव करने का विकल्प होता है। एक अध्ययन में तथ्यगत विश्लेषण करके यह भी दिखाया गया है कि फ़ायदे के पदों से होने वाली कमायी, विपक्ष की कमज़ोरी और पूँजी की शक्तियों के बीच गठजोड़ के कारण सार्वजनिक जीवन में एक ऐसा ढाँचा बनता है जिससे राजनीतिक क्षेत्र को भ्रष्टाचार से मुक्त करना तकरीबन असम्भव लगने लगता है।

अपना छत्तीसगढ़ / अक्षय लहरे / संपादक
Author: अपना छत्तीसगढ़ / अक्षय लहरे / संपादक

The news related to the news engaged in the Apna Chhattisgarh web portal is related to the news correspondents. The editor does not necessarily agree with these reports. The correspondent himself will be responsible for the news.

Leave a Reply

You may have missed

error: Content is protected !!