राहुल वास्तविक भारत को वापस खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। उम्मीद है कि जहां और जिन राज्यों से राहुल की यात्रा गुजरेगी, वहां की सरकारों को जन सरोकार पर बात करनी होगी। यह इस यात्रा की सबसे बड़ी कामयाबी होगी। इसके अलावा भाजपा सरकार द्वारा कमजोर कर दिये संघीय ढांचे को भी फिर से खड़ा करने में मदद मिलेगी क्योंकि राहुल विभिन्न राज्यों से होकर गुजर रहे हैं।

राहुल गांधी लगभग एक माह पहले जब कन्याकुमारी से अपनी ऐतिहासिक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ पर निकले थे, तभी से कहा और माना जा रहा था कि यह यात्रा सहज और आसान नहीं होगी। सच कहा जाये तो उदयपुर में कांग्रेस की हुई चिंतन संकल्प बैठक में इस आशय का जब निर्णय लिया गया था, तो कई मानते थे कि या तो यह यात्रा निकलेगी ही नहीं या फिर महज खानापूरी के लिये इसका आयोजन होगा। अनुमानों के विपरीत इसका गंभीर सोच-विचार के साथ न केवल आयोजन किया गया वरन वह जिस विशाल जन समुदायों को अपने साथ लेकर चल रही है वह सबके सामने है। बेशक यह एक बड़ा निर्णय था। ऐसा आयोजन सदियों में एकाध बार ही होता है और लाखों नेताओं में किसी-किसी के ही जीवन काल ऐसा कर सकना सम्भव हो सकता है। राहुल गांधी को शायद नियति ने इसके लिया चुना और वे 300 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर चुके हैं। निर्विवाद रूप से यह एक कठिन यात्रा है और जैसे-जैसे यह आगे बढ़ेगी, इसकी दुश्वारियां भी बढ़ेंगी। पहली बात तो यही है कि भौतिक कारणों के चलते यह एक कठिन यात्रा है। उमस और मानसून को पूरी तरह से विदा न कहे दक्षिण से निकली यात्रा सभी तरह के मौसमों का सामना करेगी। 3570 किमी चलना हर किसी के लिये सम्भव नहीं है।

खैर, इसके रास्ते में आने वाली दूसरी दिक्कतों की बात करें तो इसे स्वीकृति या प्रशंसा के पहले उस चिर-परिचित प्रक्रिया से गुजरना होगा जिसका मुकाबला हर नये या अनूठे काम करने वाले को करना ही होता है। सबसे पहले तो यात्रा की उपेक्षा की गयी। वह इसलिये कि ज्यादातर को लगता नहीं था कि यह वाकई हो पायेगी। यह न केवल हो रही है वरन वह समय के पहले ही प्रारम्भ हो गयी है। अक्टूबर निर्धारित था, पर सितम्बर में ही शुरु हो गई। फिर जब आरम्भ कर ही दी गयी तो इसका उपहास उड़ाया गया (अब भी उड़ाया जा रहा है)। ऐसा स्वाभाविक ही है क्योंकि जिस व्यक्ति की छवि वर्षों की मेहनत और करोड़ों रुपये खर्च कर एक असफल, नाकारा व बुद्धिहीन की बनाई गयी थी, तो उपहास उड़ाने वाले इस अवसर पर कैसे पीछे रह सकते थे? राहुल लोकप्रिय न हो जायें, इसके लिये भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता और इस काम के लिये नियुक्त लोगों ने लगातार अभियान छेड़े (थोड़े बहुत अब भी जारी हैं), पर यात्रा को प्रारम्भिक दौर से ही मिली कामयाबी से वह बहुत जल्दी ठंडा होने लग गया। जब यह उपाय भी काम न आया तो आलोचना शुरु की गयी। इसके बाद भी पद यात्रा को कोई फर्क नहीं पड़ा तो हास्यास्पद व आजमाये तरीकों से इसका विरोध किया गया कि इससे नागरिकों को तकलीफ हो रही है, राहुल महंगी टीशर्ट पहनते हैं, लड़कियां उनसे लिपटकर चलती हैं, आदि।

शुरुआत में लगा था कि भारतीय जनता पार्टी प्रशासित होने के बाद भी कर्नाटक तक सब ठीक-ठाक ही रहेगा और जो कठिनाइयां आनी हैं, वे इसके बाद के राज्यों से शुरु होंगी। हुआ कुछ और ही। राहुल की यात्रा की तकलीफें मानों उनका इंतज़ार कर रही थीं। उनके आने की पूर्व संध्या पर ही यात्रा सम्बन्धी पोस्टर फाड़े गये, एक युवक से ‘पेसीएम’ वाली टी शर्ट उतरवाई गई। यह सारा कुछ बता रहा है कि राहुल की यात्रा स्वीकृति के पहले के आवश्यक दौर तक पहुंच गयी है। सच कहा जाये तो यह यात्रा अगर बगैर किसी अवरोध के अपने गंतव्य तक पहुंचती है तो इसका महत्व और सारा चार्म जाता रहेगा। जिस प्रकार से देश का स्वतंत्रता आंदोलन औपनिवेशिक शासकों द्वारा दी गयी भीषण तकलीफों, उत्पीड़न और अत्याचारों को सहकर सफल हुआ था, वैसे ही इस यात्रा की कामयाबी तभी चमकदार और प्रभावशाली होगी, अगर वह विरोधी दलों, उनकी सरकारों और समर्थकों द्वारा दी गयी यातनाओं से होकर कश्मीर में अपना परचम लहराये। शाहीन बाग आंदोलन और किसान आंदोलन की कामयाबी यही है कि उनके आंदोलनकारियों ने गांधीवादी तरीकों से सत्ता के दमनकारी कदमों और उनके समर्थकों द्वारा फैलाई हिंसा को सहा है।

कर्नाटक से एक और अच्छी बात यह हुई है कि राहुल गांधी ने अब अपने विचार भी बतलाने शुरु कर दिये हैं, जो यात्रा के अब तक के चरण में केवल लोगों की बातें सुनने का काम कर रहे थे। हालांकि जब यह यात्रा प्रारम्भ हुई थी, तभी से लोगों की राय विभाजित थी- कुछ का मानना है कि इतने बड़े आडियेंस का फायदा लेकर उन्हें भरपूर बोलना चाहिये ताकि कांग्रेस का संदेश जन-जन तक पहुंचे; इसके विपरीत राहुल समेत बड़ी संख्या में लोगों के अनुसार सिर्फ सुनना ही श्रेयस्कर होगा। हालांकि जिस प्रकार से उनके बोलने के अनेक अवसर सामने आ रहे हैं, इसका भी सकारात्मक संदेश जा रहा है। ऐसा भी अनुमान है कि विरोधी विचारधाराओं वाली सरकारों द्वारा प्रशासित राज्यों में अनेक संकट आने लगेंगे और उन्हें बोलना लाजिमी हो जायेगा। यह अच्छी बात होगी कि इससे देश का राजनैतिक नरेटिव सेट होगा। अब धीरे-धीरे वह विमर्श बन रहा है जो अब तक योजनाबद्ध तरीके से केन्द्र सरकार और भाजपा द्वारा भुलाया जा रहा था। अपने प्रचार तंत्र के जरिये भाजपा ने एक नकली भारत बना रखा है, जिसमें महंगाई, भुखमरी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, घर, सड़क, बिजली, पानी की बुरी हालत, अंधाधुंध निजीकरण, विद्रूप पूंजीवाद आदि विषय ही नहीं हैं। इसकी बजाय हिन्दू-मुसलिम, श्मशान-कब्रिस्तान, 80 बनाम 20, पाकिस्तान, अफगानिस्तान, चीन, 56 इंच, लाल आंखें, विश्व गुरु जैसी भावनात्मक बातों को चर्चा के केन्द्र में लाया गया है। केन्द्र-भाजपा की अवधारणा का आधार नफरत और विभाजन है। उम्मीद है कि यात्रा की पूर्णता तक यह हवाई किला ध्वस्त हो चुका रहेगा- 2003 के ‘शाइनिंग इंडिया’ की तरह। राहुल वास्तविक भारत को वापस खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। उम्मीद है कि जहां और जिन राज्यों से राहुल की यात्रा गुजरेगी, वहां की सरकारों को जन सरोकार पर बात करनी होगी। यह इस यात्रा की सबसे बड़ी कामयाबी होगी। इसके अलावा भाजपा सरकार द्वारा कमजोर कर दिये संघीय ढांचे को भी फिर से खड़ा करने में मदद मिलेगी क्योंकि राहुल विभिन्न राज्यों से होकर गुजर रहे हैं। गैर भाजपायी राज्य एकत्र होकर केन्द्र के सामने राज्य की राजनैतिक व संविधान प्रदत्त ताकत को फिर से हासिल करने का प्रयास करेंगे।

माना जा रहा है कि तेलंगाना के विकाराबाद के बाद महाराष्ट्र पहुंचने पर यात्रा की असली दिक्कतें शुरु होंगीं। मध्यप्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब, जम्मू-कश्मीर सभी जगह समस्याएं आएंगी। केवल राजस्थान में अनुकूल माहौल होगा। वैसे भी राहुल की यात्रा भारत को जोड़ने की है, इसलिये वे लोग जो इसे तोड़ना चाहते हैं या जो चाहते हैं कि लोग आपस में न जुड़ें, इसे सफलतापूर्वक पूरा होते नहीं देखना चाहेंगे। सभी जानते हैं कि वे लोग कौन हैं जो इसे पूरा नहीं होने देंगे? इनमें से प्रमुखतः वे हैं जो मानते हैं कि भारत केवल बहुसंख्यकों का है और इसमें अन्य सम्प्रदायों के लिये कोई जगह नहीं है। ये लोग देश का इतिहास व भूगोल ही नहीं वरन यहां का नक्शा, राष्ट्र ध्वज और संविधान तक बदलना चाहते हैं। इस नये भारत में मुसलिम, ईसाई, समेत किसी भी विदेशी मूल के लोगों को मतदान का अधिकार नहीं होगा। ये वे लोग हैं जो खुद के लिये श्रेष्ठता का भाव रखते हैं, वर्ण व्यवस्था में विश्वास करते हैं, आर्थिक गैर बराबरी को सही बतलाते हुए कुछ को अमीर व शेष अधिसंख्य को गरीब बनाये रखना चाहते हैं। वे विपक्ष मुक्त भारत चाहते हैं। अपने दल का एकछत्र व अनंत काल तक राज चाहने वाली भाजपा काफी हद तक सफल होती तो दिख रही है परन्तु कांग्रेस एकमात्र ऐसी पार्टी है जो कमजोर होने व अनेक चुनाव हारने के बाद भी लड़ रही है। उसके विधायक विभिन्न राज्यों में तोड़े जाते हैं, उसकी राज्य सरकारें गिराई जाती हैं। उनके नेताओं व जनप्रतिनिधियों को केन्द्रीय जांच एजेंसियों के जरिये डराया-धमकाया जाता है, बार-बार पूछताछ के नाम पर इन एजेंसियों के दफ्तरों में जवाब देने के लिये बुलवाया जाता है ताकि वे भाजपा और उसकी सरकारों का विरोध न करें। खुद राहुल एवं सोनिया गांधी घंटों प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारियों के सामने गुजार चुकी हैं। इन सारी तकलीफों से पार जाने पर ही राहुल को ‘गांधी’ मिलेंगे।

अपना छत्तीसगढ़ / अक्षय लहरे / संपादक
Author: अपना छत्तीसगढ़ / अक्षय लहरे / संपादक

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