ApnaCg @महिलाए द्वारा परोशी जा रही शराब में जहर, अबकारी और स्थानीय पुलिस खानापूर्ति कर मौन

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ग्रामीणों ने लगाया आरोप रतनपुर एवं सीपत पुलिस के संरक्षण में हो रहे अवैध कारोबार,

शेखर बैशवाड़े@नेवसा(अपना छत्तीसगढ़) –बिलासपुर जिला के बेलतरा विधानसभा क्षेत्र में अवैध शराब की लत तेजी से बढ़ती जा रही है । इस तेजी से बढ़ते शराब की मांग को पूरा करने के लिए शराब माफिया द्वारा जहरीले पदार्थो का खुलकर प्रयोग किया जा रहा है। इन जहरीले पदार्थो के प्रयोग से आदिवासियों के जीवन में तेजी से कमी आ रही है। स्थानीय स्तर पर बनने वाले देसी शराब और हड़िया भी इससे अछूते नहीं है। जिसमें यूरिया और बेशरम की जड़ी मिलाने से एक ही रात में पास शराब के लिए तैयार हो रही है । जिसे बनाकर महिलाएं खुलेआम बेलतरा विधानसभा क्षेत्र में बिक्री कर रही है । जिसे लेकर आबकारी विभाग और स्थानीय रतनपुर एवं सीपत पुलिस प्रशासन मौन है उच्च अधिकारियों के पास शिकायत होने पर छोटी मोटी कार्रवाई खानापूर्ति के रूप में करके मौन हो जाती है । जिसके चलते बेलतरा विधानसभा अवैध शराब माफियाओं का गढ़ बन गया है जहां पर 24 घंटे शराब परोसी जा रही है ।

इस संबंध में ग्रामीणों से मिली जानकारी के अनुसार बताया जा रहा है कि बेलतरा विधानसभा क्षेत्र में शराब की लत तेजी से बढ़ती जा रही है। तेजी से बढ़ते शराब की मांग को पूरा करने के लिए शराब माफिया द्वारा जहरीले पदार्थो का खुलकर प्रयोग किया जा रहा है। इन जहरीले पदार्थो के प्रयोग से आदिवासियों के जीवन में तेजी से कमी आ रही है। स्थानीय स्तर पर बनने वाले देसी शराब और हड़िया भी इससे अछूते नहीं रह गए हैं। शराब बनाए जाने के बाद प्रयोग किए गए जहरीले पदार्थो वाले अवशेषों को फेंक दिए जाने से इसे खाकर मवेशियों की भी मौत हो रही है।

जहरीले पदार्थो के प्रयोग से बन रही है शराब

बिलासपुर जिले के बेलतरा विधानसभा क्षेत्र में करीब एक दशक से शराब विरोधी आंदोलन चल रही है। शराबबंदी महिला समिति समेत अन्य लोगों ने बताया कि बिलासपुर जिले के बेलतरा विधानसभा क्षेत्र में जिस बड़े पैमाने पर देसी शराब की खपत हो रही है। उस मात्रा में पारंपरिक तरीके से शराब बना पाना संभव ही नहीं है। महिलाओं ने बताया कि पारंपरिक रूप से देसी शराब का निर्माण महुआ को कुछ जड़ी बूटी की सहायता से गला कर बनाया जाता था। शराब बनाने की यह प्रक्रिया एक सप्ताह से 10 दिन में पूरी होती थी। लेकिन शराब के बढ़ते प्रचलन ने शराब बनाने की इस प्रक्रिया को विलुप्त कर दिया है। कम समय में अधिक शराब बनाकर अवैध कमाई करने के चक्कर में शराब माफिया देसी शराब बनाने के लिए नौशादर,यूरिया,डीएपी, तम्बाकू, निंद का गोली, जैसे बेहद खतरनाक रसायनों का प्रयोग कर रहे हैं। इन रसायनों का प्रयोग महुआ को कम समय में गलाने के लिए किया जाता है। इन रसायनों से बनने वाले शराब में नशा भी अपेक्षाकृत अधिक होता है। लेकिन इसका परिणाम स्वास्थ्य पर बेहद खतरनाक होता है। यह शरीर के नर्व्स सिस्टम,किडनी और आंतों को नुकसान पहुंचती है।

नशे में बढ़ रही है हत्या जैसे संगीन अपराध

शराबबंदी महिला संघर्ष समिति की ने बताया कि शराब सेवन की बढ़ती प्रवृत्ति से आदिवासी समाज में अपराध का ग्राफ भी लगातार बढ़ते जा रहा है। उन्होनें बताया कि शराब के नशे में मारपीट और बेवजह विवाद तो आए दिन होते रहते हैं। इससे सामाजिक सौहार्द्र का माहौल प्रभावित हो रहा है। गांव के किसान ने बताया कि शराब की वजह से जाली जैसे एक छोटे से पंचायत में महुआ शराब की वजह से कई लोगों की जान भी जा चुकी है। वही कई बड़ी वारदातें हो चुकी है।

शराबबंदी को लेकर दुविधा

आबकारी एक्ट में आदिवासी समाज के लोगों को 5 लीटर तक शराब बनाने की छूट दी गई है। इस छूट को लेकर समय-समय पर विवाद की स्थिति निर्मित होती रही है। शराब की बढ़ती प्रवृति से परेशान आदिवासी समाज के कुछ जनप्रतिनिधि समाज में पूर्ण शराबबंदी लागू करने की वकालत कर रहे हैं,वहीं दूसरी ओर संस्कृति व परंपरा के नाम पर छूट जारी रखने का समर्थन कर रहा है। आदिवासी समाज शराब की छूट को लेकर कुछ विशेष लोगों द्वारा शासन को गुमराह किया गया है। हकीकत यह है कि आदिवासी समाज के किसी भी पूजा में शराब का नहीं बल्कि हड़िया का प्रयोग किया जाता है। इसलिए शराब बनाने व सेवन करने का छूट देना पूरी तरह गलत है।

खाद्यान्न योजना भी सवालों के घेरे में

प्रदेश सरकार के द्वारा मुख्यमंत्री खाद्यान्न योजना के तहत सस्ते दर में दिए जा रहे चावल का प्रयोग शराब बनाए जाने को लेकर जिले में विवाद होता रहा है। चावल योजना आदिवासी समाज के लिए अभिशाप साबित हो रहा है क्योंकि चावल का प्रयोग बड़े पैमाने पर शराब बनाने के लिए किया जा रहा है। शुरू से ही शराब समेत सभी प्रकार नशे के घोर विरोधी रहे हैं।

मवेशियों पर भी पड़ रहा है असर

समिति की महिलाओं ने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में बन रहे भारी मात्रा में देसी शराब के दुष्प्रभाव से मवेशियों की भी मौत हो रही है। ग्रामीणों ने बताया कि शराब बनाने के बाद अवशिष्ट पदार्थो को घर के बाहर फेंक दिया जाता है। इस अवशिष्ठ पदार्थ में डीएपी,नौशादर और यूरिया जैसे जहरीले पदार्थ के साथ नशा भी होता है। जहर और नशे की वजह से गाय,बकरी जैसे मवेशियों की असमय ही मौत हो जाती है।

शराब बनाने का गढ़

कर्मा, रामपुर,नगपुरा,टेकर,भिल्मी, पांडेपुर,उच्चभट्टी,मचखडा, जाली,बेलतरा,बेल पारा, टिकरीपारा,सलखा,बसहा,टेकर,नगपुरा,भिल्मी,पाण्डेपुर इन दिनों शराब बनाने का प्रमुख केंद्र बना हुआ है जहां धड़ल्ले से लोग महुआ शराब खरीदकर पी रहे हैं जिसे आबकारी विभाग और स्थानीय पुलिस प्रशासन रोकथाम करने में नाकाम साबित हो रही है ।

अपना छत्तीसगढ़ / अक्षय लहरे / संपादक
Author: अपना छत्तीसगढ़ / अक्षय लहरे / संपादक

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